Monday, 2 December 2024

चुनाव

 कचोट रहा है मन मुझे कुछ दिनों से,
पूछ रहा है एक ही सवाल बार बार,
क्या अलग कर सकता था मैं?
वो फैसला क्या पलट सकता था मैं?
उस राह से क्या वापस लौट सकता था मैं?  



फिर रह रह के वो मोड़ याद आता है,
चुनाव था ज़िम्मेदारी और कमजोरी के बीच,
ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबा, मैं
बस कुछ पल सुकून खोजता,
कमजोरी की राह पर चल पड़ा,
ये समझा कर खुद को, लौट आना है,
थोड़ी ही देर में जिम्मेदारियों का दामन थामने.

जिम्मेदारियों ने भी दी आवाज़ मुझे,
कुछ पल सुस्ताने के बाद,
एक दो बार नहीं कई कई बार,
पर क्या ही सुकून था कमजोरी की छाँव में.... 
मैं अनसुना कर उन पुकारों को, 
कमज़ोरियों की तरफ़ ही बढ़ता रहा,

अपने पाश में बड़ी शिद्दत से,
कस रही थी कमज़ोरियाँ मुझे,
और धीरे धीरे जिम्मेदारियाँ,
जैसे ख़ामोश हो गई थी.....

या वो बुलाती थी कई बार चीख के मुझे,
मैं कमज़ोरियों में ख़ुद को ख़ुद ही जकड़ लेता,
हाथ छुड़ाना नहीं चाहता था मैं,
जिम्मेदारियों का कर्कश स्वर,
पहले चुभता तो अब डराता था मुझे ....

आज मेरे सिरहाने आ बैठी हैं,
दोनों ओर जिम्मेदारी और कमजोरी,
आँख भींच कर बैठा हूँ, भयातुर मैं,
जिम्मेदारी से आँख चुरानी है,
और कमजोरी को आँख दिखाना चाहता हूँ मैं,

पर संकट ये नहीं है,
द्वंद्व तो ख़ुद से आँख मिलाने का है,
और सारी जद्दोजहद भी तो,
आँख खोलने की ही है..... 


 
लेकिन इस सब के बीच,
एक लहर उठती है मन में,
क्यों न इस द्वंद्व से परे चले चलूँ मैं,
फिर एक मोड़ पर एक फ़ैसला,
लेने का जब आए मौक़ा,
मैं ना दायें देखूँ ना बायें,
बस मूँद लूँ मैं आँखें,
आख़िरी बार के लिए....

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