Saturday, 19 July 2025

बिंदी​ और आईना

रेलवे स्टेशन के बाथरूम के आईने पर चिपकी

कुछ बिंदियों की कहानी है ये ​.....


लाल नीली हरी नारंगी कुछ चमकीली कुछ फीकी​,

कई बिंदियाँ बेतरतीब सी उस आईने पर चिपकाई गई हैं​... 

​बिंदियों  में औरतें छोड़ गई हैं​ अपने किस्से उस आईने पर​,

कुछ बिंदियों पर जम गई है धूल की एक परत फिर भी​,

वो कहानी को जीवंत बनाये रखने की भरसक प्रयास कर रही हैं..


वाश बेसिन पर हाथ मुंह धोते हुए अक्सर उन लड़कियों, 

महिलाओं, प्रेमिकाओं, माँओं ने एक हाथ से बिंदी​,

माथे से निकाल कर सामने वाले आईने पर धर दी होंगी​,

पर बाहर खड़े दोस्त, संगी, या पति और बच्चों की पुकार​,

साथ ही ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ाहट में हर बार​  शायद​, 

वो बिंदियाँ यूँ ही उस आईने पर अनजाने में छूट जाती होंगी​... 


​यहाँ ख़ाली माथे पर उन महिलाओं का हाथ जा जा कर रुक जाता है​,

​और उधर बिंदियों से भरा वो आईना

हर एक कहानी को समेट रहा अपने में​...  

और बाद उसके हर वो चेहरा जो,

उस वाश बेसिन पर मुंह धोने को झुकता होगा​,

वो बिंदियों की बनावट से, 

उनकी धारक की कहानी सोच के चकित होता होगा​....


जैसे वो गाढ़े लाल रंग की बड़ी सी बिंदी ​.... 

अपने ढलते यौवन की कहानी ​कह रही हो​,

बच्चे घर से दूर नौकरी करते हैं​,

और ये माँ सादे श्रृंगार के साथ​,

अपने लाल के शहर जा रही है​, 

अचार पापड़ मिठाई में उस बच्चे का​, 

बचपन अपने आँचल में समेटे..


वहीं थोड़ी दूर एक छोटी काली बिंदी​, 

​इक नवयौवना की कहानी है​,

​उसने अभी साज​-श्रृंगार​ करना सीखा​ ही है​,

तो वो ​है नयेपन​ के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश​.... 

एक चटख लाल रंगी चमकीली बिंदी​,

नवविवाहिता की नई शुरुवात की पहचान​... 


वही दूसरे कोने में बेहद रंगीन बिंदियों का गुच्छा सा है​,

कुछ गोल कुछ तिलक सरीखी कई आकारों की​,

गुलाबी पीली नीली हरी रंगी बिंदियाँ जैसे​,

परिपक्वता की राह पर चलती उन बेटियों​, 

उन प्रेमिकाओं और उस लड़की का किस्सा कहती ​हैं,

जो अपने शहर अपने परिवार से इतर कुछ नया करने की जुगत में हैं …

नए रास्तों की चमक के साथ साथ रूढ़ियों के विरोधाभास में,

रोजमर्रा की आपाधापी की कहानी अपने आकार और रंगों के कलेवर में,

हर दिन का संघर्ष छुपाती हैं वो आईने पर चिपकी बिंदियाँ.....


एक और बिंदी है बिल्कुल आईने के निचले छोर पर​,

पुरानी तस्वीर सी धुंधली पड़ती थोड़ी फीके लाल रंग की​,

मानो ढलती वय के कंपकंपाते हाथ ने अपने जीवन को​,

उस आईने में निरखते हुए बिंदी वहाँ रख भर दी हो..


और फिर वही हड़बड़ाहट है​,

बाहर से आते शोर की पुकार की​, 

और वो अपने घर​-बार के किस्से​,

अपने रोजमर्रा की थकान​, 

एक छोटी से बिंदी में ​छोड़,

नए सफ़र की ओर निकल पड़ती है 

और वो आईना अगले चेहरे की​,

अब तक की कहानी सुनने को तत्पर बैठा है​.... 

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