"फ़ोन उठाओ साकेत! फोन उठाओ." मिसेज शर्मा बहुत चिंतित थी. बहुत देर से साकेत का नंबर नहीं लग रहा था. और जब फ़ोन लगा तो वो फ़ोन नहीं उठा रहा था. मिसेज शर्मा का मन अशांत हो गया. शॉपिंग करने जब आयी थी तब भी साकेत अपने कमरे से बाहर नहीं आया था।
घर के नंबर पर भी कई बार ट्राय किया पर कोई जवाब नहीं मिला. वो अधिक बेचैन हो उठीं.
"अभी तो रमा भी नहीं होगी घर पर, किसे कॉल करूँ?" सुमन अपने आप में ही बड़बड़ाने लगीं। तभी शर्मा जी का फ़ोन आया.
उधर से सिर्फ इतना कहा की राजेश को फ़ाइल लेने घर भेज रहा हूँ. मिसेज शर्मा कुछ कहती उससे पहले ही डिसकनेक्ट हो गया. वो सोचने लगी, क्या उसे शर्मा जी से बात करनी चाहिए? लेकिन वो कहे भी तो क्या?
रोज एक ही बात पर घर की शान्ति भंग हो जाती है. बाप बेटे के बीच की तनातनी शाम की चाय से शुरू होकर रात के खाने तक निरन्तर चलती रहती है. सुमन के समझने के बावजूद भी तो शर्मा जी अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाते थे और साकेत भी कई बार घर छोड़ने की बात कर चुका था .
आज कल खाने की टेबल पर पिता पुत्र का सामना नहीं हुआ था तो घर में कुछ दिनों से माहौल शांत है.
पिछले कुछ दिनों से साकेत बदला बदला सा था.बहुत कम बोलता है, खाने का भी ध्यान नहीं रहता उसे. सुबह बहुत देर से उठता है, माँ के कई बार पूछने के बाद भी उसने कुछ नहीं बताया.
२० वर्षीय साकेत लखनऊ के बड़े उद्योगपति सुरेश शर्मा का एकलौता बेटा है. लखनऊ के एक नामी विद्यालय से पढाई करने के बाद साकेत का आर्ट्स पढ़ने का मन था, शर्मा जी का मानना था कि साकेत कॉमर्स की पढ़ाई करके उनका प्रतिष्ठान संभाले.
साकेत के न चाहते हुए भी उन्होंने उसका दाखिला फैकल्टी ऑफ़ कॉमर्स में करा दिया. साकेत ने पापा को समझाने की बहुत कोशिश की पर हर बार वो डाँठ कर उसे चुप रहने को कहते. इस तरह साकेत बुझा बुझा सा रहने लगा. उसने कॉलेज जाने से मना किया तो शर्मा जी ने उसे ऑफिस आने का आदेश सुना दिया.
"बहुत हुआ बचपना, अब बड़े हो गए तुम, छोटी छोटी बातों के लिए जिद करना ठीक नहीं. क्या कहेंगे मेरे दोस्त? पापा के बिजनेसमैन होने के बाद भी बेटा गालियों में घूम घूम कर चित्र बना रहा है. आखिर रखा क्या है आर्ट्स में?" शर्मा जी नाराज हो गए थे. "लेकिन पापा! आर्ट्स सिर्फ पेंटिंग नहीं. उसमें और भी कई सारे सब्जेक्ट्स होते हैं. मुझे ह्यूमैनिटीज़ पढ़कर सोसाइटी के लिए कुछ करना है. "साकेत ने पापा को समझाने की एक और कोशिश करने की सोची.
"हाहाहाहा." शर्मा जी ठहाका लगा कर हँस दिए. "तो मना किसने किया है,बेटा। मेरे बिजनेस में हाथ बंटाओ, मैं खुद भी एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाना चाहता हूँ. पिताजी का सपना था कि शहर में माँ के नाम से एक अस्पताल हो जिसमें गरीब लोगों को मुफ्त में इलाज हो."
"लेकिन पापा, सिर्फ चैरिटेबल ट्रस्ट से ही सोसायटी के लिए कुछ किया जाए, ये जरुरी तो नहीं."
साकेत फिर बोल पड़ा.
"बहुत हो गया साकेत, अब इस बारे में कोई बहस नहीं चाहिए मुझे।" शर्मा जी इतना कहते हुए खाने की थाली छोड़ कर कमरे में चले गए.
माँ साकेत को रोटी देते हुए बोली, "बेटा, पापा ने अपनी जिंदगी में बहुत से अनुभव लिए हैं, अगर उनके अनुभवों का इस्तेमाल करोगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी. और फिर इतनी प्रॉपर्टी, हमारा सब कुछ कल तुम्हें ही तो संभालना है."
"लेकिन माँ,...” साकेत कुछ कहे , तभी शर्मा जी ने उन्हें आवाज देकर अंदर आने को कहा. और मिसेज शर्मा साकेत को खाना देकर अंदर चले गयी.
साकेत अब थक चुका था. उसे अब कोई रास्ता नजर नही आ रहा था. पिछले हफ्ते साकेत के दोस्त अनिल ने उसे एक समाधान तो दिया लेकिन उससे उसका तनाव कम न हुआ.उलटा साकेत अब गलत संगत में पड़ गया था .साकेत ड्रग्स लेने लगा था.पैसे की कमी थी नहीं, कॉलेज जाने के बहाने से उसने होटल में जाकर हीरोइन लेना शुरू दिया था.
ये सब घटनाएं मिसेज शर्मा के मन को और कमजोर करने लगीं. ड्राइवर को बार बार स्पीड बढाने के लिए कहती हुई मिसेज शर्मा अपने पड़ोसियों को कॉल करने लगीं। संयोगवश किसी से भी संपर्क न बन पाया तो अंत में शर्मा जी को कॉल करके मिसेज शर्मा ने उन्हें ही घर आने को कहा.
वो अंदर ही अंदर खोखला हो गया था. जिंदगी में क्या रहा है, क्यों हो रहा है, उसे कुछ समझ नहीं रहा था. तंग आ चुका था, इन सबसे छूटने का रास्ता ढूंढने को बेचैन था साकेत.
और आज उसे वो रास्ता उसे मिल गया था. साकेत चुपके से लॉकर से रिवाल्वर निकाल लाया. बहुत देर तक वह उसे देखता रहा. यूट्यूब पर कई वीडियो देखी थी उसने, कि कैसे रिवाल्वर चलायी जाती है. एक पल तो उसे बहुत डर लगा था. फिर अपनी कमीज की बाँह समेट, आँख बंद और दांत भींच कर उसने इंजेक्शन लगाया. उसे अब अच्छा लगने लगा था. एक ही झटके में उसने रिवाल्वर अपने माथे पर रखी और अगले ही पल ट्रिगर दबा कर अपनी जीवनलीला समाप्त करने का प्रथम एवं अंतिम प्रयास।
जब मिसेज शर्मा घर पहुंची तो बाहर एम्बुलेंस देख कर उनके हाथ पाँव फूल गए. अनहोनी की आशंका से विचलित वे कार से उतरते ही गश खाकर पड़ी.
भाग कर शर्मा जी ने उन्हें संभाला. जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को अस्पताल में पाया. शर्मा जी को सामने देख कर मिसेज शर्मा ने साकेत के बारे में पूछा तो उन्होंने दूसरी ओर इशारा कर दिया.
साकेत को बचा लिया गया था,एक महीने बाद साकेत स्वस्थ हुआ तो शर्मा जी उसके पास आकर बोले, "बेटा ! एक बार हमारे बारे में भी सोच लिया होता तुमने."
साकेत मुस्कुरा दिया. आधे घंटे तक मृत्यु और जीवन के बीच के उस पड़ाव ने उसे जीवन का मूल्य समझा दिया था. उसने यह जान लिया कि जीवन ख़त्म कर लेने से समस्याएं सुलझती नहीं बल्कि और उलझती हैं.
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