Thursday, 18 February 2021

कि लड़की हो तुम.....

 मुझे हदें दिखाते हैं सब  तुम ये काम न करो, कि लड़की हो. ये बात न कहो, कि लड़की हो. इस राह न चलो, कि लड़की हो. मुँह बंद कर सब सहो, कि लड़की हो.



मेरी मर्यादा बताते हैं सब 

कि लड़की हो, घर की इज्जत हो तुम. 

कि कपड़ों की नाप ही तुम्हारा चरित्र है अब. 

कितनी ही समझ हो जाये दुनिया की, नासमझ हो तुम 

कि सामर्थ्य से नहीं, पति के नाम से ही पहचान है अब. 



मेरी सीमायें बांधते हैं सब. 

अकेले बाहर कैसे जाओगी, कि अबला हो तुम. 

मोटर कैसे चला पाओगी, कि कमज़ोर हो तुम.

अरे नौकरी कैसे करोगी, बेटी नहीं बहू जो हो तुम. 

और सबसे अहम्, फैसले कैसे लोगी, भावुक हो तुम.


मेरे लिए फैसले लेते हैं सब. 

किसी लड़के से बात भी कर लेना, असंगत है तुम्हारे लिए. 

यूँ ही झोला उठाये घूमने निकल जाना, अप्रासंगिक है तुम्हारे लिए 

किसी पुरुष के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं है तुम्हारे लिए 

अपना जीवन होम कर देना, एकमात्र उद्देश्य है तुम्हारे लिए 


मुझे मेरी जगह दिखाते हैं सब. 

कि कभी पिता, कभी भाई और, कभी पति-पुत्र से संरक्षित हो तुम. 

कि गर स्वतन्त्र हो गयी तो समाज के लिए चुनौती हो तुम 

किसी से यदि सवाल कर लिया तो निरा उद्दंड ही हो तुम. 

और जो किसी को पलट के जवाब ही दे दिया तो उत्छ्रंखल व निर्लज्ज हो तुम. 


मुझे समय बताते हैं सब. 

कि देर रात तक बाहर रहना, सुरक्षित नहीं तुम्हारे लिए 

देर रात फ़ोन पर बतियाना, उचित नहीं तुम्हारे लिए.  

कि अब ब्याह लो, घर बसा लो 

कि काम तो शादी के बाद भी हो सकता है. 

कि अब परिवार को आगे बढ़ाओ, कि तुम्हारा योगदान चाहिए 

उसी समाज को जो तुम्हें ही हाशिये पर रखता है। 



ये कुछ अटपटे सवाल हैं. 

जो हर दिन पूछे जाते हैं मुझसे 

कि लड़की हूँ मैं.

ये कुछ अजीब बातें हैं.

जिन्हें हर रोज सोचती हूँ मैं.

कि लड़की हूँ मैं.

ये कुछ अनकहे ताने हैं  

जिनसे हर पल एक नयी जंग लड़ती हूँ मैं 

कि लड़की हूँ मैं.


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