Saturday, 19 June 2021

वो पिता ही है

बच्चों की हर ख़्वाहिश हो जाती पूरी बिन अबेर,
पटाखों की सूची में चाहे हो कितना ही हेर फेर,
सबकी जरूरतों का जब लगा हो ढ़ेर,
तो  खुद के एक जोड़ी कपड़े सिलने में हर साल होती देर..

पुराने जूते, कमीज़ का पलट के जो कॉलर सिला जाता है,
उसे नजरअंदाज़ कर वो एक ट्यूशन की फीस जोड़ पाता है,
सबके लिए करते सोचते जब भी वो थक जाता है,
एक करवट लेके वो फिर  ख़यालों में डूब जाता है..

  वो  पिता ही है
जो खुद एक अपनी पसंद का एक भी काम कर पाया
पर बच्चों की हॉबी क्लास के लिए हर महीने कुछ पैसा अलग से बचाता है.

 कि लड़की को पढ़ा लिखा के, उसके लिए अच्छा परिवार ढूँढना है,
बेटे को हर कदम पर थाम कर, उसके साथ अपना लड़कपन जीना है,
जो खुद कर पाया वो, जो फैसले मन मार के लेने पड़े उसे ,
यही चिंता है हर पल कि बस उसी राह से उसके बच्चे गुजरे..

कठिन है जीवन, जानता है कि सब कुछ उसके बस में नहीं,
कहाँ कर पाता है वो सहन, जो ठोकर लगे जिगर के टुकड़ों को कभी,
कोशिश करता है पूरी, एक कुम्हार की तरह, जिंदगी की भट्टी में भी,
वक्त की मार से बचाने को, काँधे पर रख कर हाथ, कहता डरो नहीं..

 वो पिता ही है
जो अपने संघर्षों और चोटों की खबर तक नहीं लगने देता
पर बच्चों को आयी एक खरोंच पर कितने ही अस्पताल नाप लेता है.

पर संघर्ष तो सबके जीवन का हिस्सा है,
उसकी ही तरह बच्चों का भी एक किस्सा है,
तभी अनुभव के मोती, वो आदेशों में पिरोता है,
लाल के लिएहर पल वो अपना सर्वस्व खोता है.

माँ रहती है आसपास, वो नेपथ्य से दिशा दिखाता है,
रोटी कमाने के उद्यम में, अक्सर प्रेम से वंचित रह जाता है,
दिन भर की थकान के बाद भी बच्चों की शैतानियां सुनने को तत्पर रहता है,
इस ख़ुशी को बरक़रार रखने को साल भर घर से दूर रहने को भी नहीं हिचकता है.

 वो पिता ही है
जो परदे के पीछे रह कर बच्चों के जीवन को निर्देशित करता है
और फिर दर्शकों के बीच खड़े हो उन्हें हौसला देता है.

 पाई पाई जोड़कर एक आशियाँ बनाता है जब,
बेटे का नाम तख्ती पर लिख के हर्षाता है तब,
खुद के लिए इतना जतन उसने किया ही है कब,
बच्चों के चेहरे की मुस्कान पर निछावर है उसके प्रयत्न सब..

चिंता है उसे हर बात की, पर ये चिंता भी उसे भाती है,
सब सुविधा जोड़ ली,पर ये सब उसे सुहाती है,
सादा जीवन उच्च विचार, मानो उसकी थाती है,
बच्चों की छोटी से सफलता ही अब उसकी उपलब्धि बन जाती है..

  वो पिता ही है
जो चुपचाप सब साजो समान जुटा कर लाता है
पर फिर श्रेय बच्चों को दे, असीम आनंद की अनुभूति करता है.

5 comments:

  1. बहुत खूब तिवारी 🌸

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  2. Replies
    1. वैचारिक उत्कृष्टता की अद्भुत पेशकश

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  3. एक एक शब्द पिता के किरदार की सत्यता दर्शा रहा है ।
    एक मध्यम वर्गीय पिता की परिभाषा लिखनी हो तो ये लिख सकते हैं ।।

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