Saturday, 17 July 2021

बाह्य-अंतर

 

कक्षा १० में  ऋतुराज की एक कविता थी "कन्यादान" 
उसकी एक पंक्ति शायद उस दिन से ही  दिल में घर कर गयी 

"माँ ने कहा लड़की होना 
पर लड़की जैसी मत दिखाई देना"

खुले तौर पर हर माँ ऐसा नहीं बोलती है अपनी बेटी से पर उसका भी डरा सहमा दिल शायद यही दुआ करता है कि मेरी बेटी लड़की तो रहे पर लड़की जैसी दिखे नहीं. 

बेटियों की भी...... 
हर दिन एक नयी कोशिश होती है एक दोहरे चरित्र को जीने की. 
हर समय यही द्वंद्व चलता है कि कैसे सामंजस्य बैठाया जाये 
मुखौटा नहीं है पर एक पर्दा बिठाना पड़ता है बाह्य और भीतर के बीच. 



एक द्वंद्व चल रहा है बाह्य-अंतर में 
चेहरा मानता है कि  विशिष्ट हों हम 
हमें जाने हर कोई 
एक अनूठी पहचान हो हमारी 
सबको रश्क़ हो मुझसे 
पलकें बिछाये सब करें इंतजार हमारा. 
एक मुआ मन है जो 
हर दिन अलग पट्टी  पढ़ाता है 

चाहता है भीड़  ही बन जाऊँ मैं 
भाग निकलूं इन झमेलों से 
बिन बताये किसी को एक सफर तय करूँ. 
जहाँ मंजिल का ठिकाना नहीं. 
सुबह-सहर ही जब बताये दिशा 
और साथ चल रहा दूसरा राही 
बता दे नाम अगले शहर का...
उस राह पर, कभी चलूँ मैं पर,
 कोई पहचान ना ले 
अपरिचित चेहरों से भरी सड़क से 
बस गुजर जाऊँ, बिना इल्म के

एक डर सा रहता है परन्तु
कि कोई जान गया अगर सच मेरा
वो अनकहे अल्फाज़, वो अनसुनी बातें....
अकेली रातें, बेचैन सवेरे,अलसाये दिन
कहीं  किसी ने पढ़ लिया मेरे चेहरे का डर अगर....

लड़की जैसा ना दिखने की वो सारी कोशिशें
एक ही पल में धता हो जाएँगी
 ये भेद खुल जाएगा
कि एक लड़की हूँ मैं ....

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