Saturday, 6 March 2021

तुम हो ......

तुम हो 
एक स़हर निखरी सी.. 
नए सफ़र पर निकलने को..
एक किरण आशा सी...
नए रंग रूप दिखाने को..
एक धूप खिलती सी.. 
सूरज को देख चलते रहने को.. 
एक सांझ ढलती सी..
दिन कोे मुकाम तक पहुंचाने को..
एक रात गहरी अंधेरी सी.. 
पास आकर साथ रह जाने को.. 
एक लहर बेढंगी सी.. 
बह कर सागर में मिल जाने को.. 




तुम हो 
एक सुवास बसंत सी..
हर कोने को खुशबू से भर जाने को..
एक फुहार पहली बारिश सी..
भिगा कर बहा ले जाने को..
एक दीपक जगमगाता सा.. 
भूले को राह दिखाने को..
एक तारा टिमटिमाता सा.. 
साथ चल कर हमराह बनने को..
एक सवाल अबूझ पहेली सा.. 
जवाब ढूँढने की कोशिश करवाने को..
एक आईना चमचमाता सा.. 
खुद के अक्स से मिलवाने को.. 



तुम हो 
एक ख्याल खुशनुमा सा.. 
हर पल सोच के मुस्कुराने को...
एक ख्वाब खूबसूरत सा.. 
खुली आँखों से देखने को..
एक एहसास महकता सा.. 
सपास महसूस करने को.. 
एक संगीत मद्धिम सा.. 
सांसों के साथ उठने गिरने को...
एक याद अतरंगी सी.. 
डूब के उसमें खुद को खोने को..
एक किताब अधखुली सी.. 
चोरी छिपे अक्सर पढ़ लेने को...

Thursday, 18 February 2021

कि लड़की हो तुम.....

 मुझे हदें दिखाते हैं सब  तुम ये काम न करो, कि लड़की हो. ये बात न कहो, कि लड़की हो. इस राह न चलो, कि लड़की हो. मुँह बंद कर सब सहो, कि लड़की हो.



मेरी मर्यादा बताते हैं सब 

कि लड़की हो, घर की इज्जत हो तुम. 

कि कपड़ों की नाप ही तुम्हारा चरित्र है अब. 

कितनी ही समझ हो जाये दुनिया की, नासमझ हो तुम 

कि सामर्थ्य से नहीं, पति के नाम से ही पहचान है अब. 



मेरी सीमायें बांधते हैं सब. 

अकेले बाहर कैसे जाओगी, कि अबला हो तुम. 

मोटर कैसे चला पाओगी, कि कमज़ोर हो तुम.

अरे नौकरी कैसे करोगी, बेटी नहीं बहू जो हो तुम. 

और सबसे अहम्, फैसले कैसे लोगी, भावुक हो तुम.


मेरे लिए फैसले लेते हैं सब. 

किसी लड़के से बात भी कर लेना, असंगत है तुम्हारे लिए. 

यूँ ही झोला उठाये घूमने निकल जाना, अप्रासंगिक है तुम्हारे लिए 

किसी पुरुष के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं है तुम्हारे लिए 

अपना जीवन होम कर देना, एकमात्र उद्देश्य है तुम्हारे लिए 


मुझे मेरी जगह दिखाते हैं सब. 

कि कभी पिता, कभी भाई और, कभी पति-पुत्र से संरक्षित हो तुम. 

कि गर स्वतन्त्र हो गयी तो समाज के लिए चुनौती हो तुम 

किसी से यदि सवाल कर लिया तो निरा उद्दंड ही हो तुम. 

और जो किसी को पलट के जवाब ही दे दिया तो उत्छ्रंखल व निर्लज्ज हो तुम. 


मुझे समय बताते हैं सब. 

कि देर रात तक बाहर रहना, सुरक्षित नहीं तुम्हारे लिए 

देर रात फ़ोन पर बतियाना, उचित नहीं तुम्हारे लिए.  

कि अब ब्याह लो, घर बसा लो 

कि काम तो शादी के बाद भी हो सकता है. 

कि अब परिवार को आगे बढ़ाओ, कि तुम्हारा योगदान चाहिए 

उसी समाज को जो तुम्हें ही हाशिये पर रखता है। 



ये कुछ अटपटे सवाल हैं. 

जो हर दिन पूछे जाते हैं मुझसे 

कि लड़की हूँ मैं.

ये कुछ अजीब बातें हैं.

जिन्हें हर रोज सोचती हूँ मैं.

कि लड़की हूँ मैं.

ये कुछ अनकहे ताने हैं  

जिनसे हर पल एक नयी जंग लड़ती हूँ मैं 

कि लड़की हूँ मैं.


Saturday, 6 February 2021

MAN AMADEH AM

 


    ऐसा बहुत बार होता है कि कोई गीत सिर्फ एक गीत ना हो के कई सारी यादों की दराज़ खोल देता है. आज जब सारी दुनिया अपने घरों में सिमटी पड़ी है , मैं कभी भी  अपने गीतों के सहारे कई जगहों की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ. उन गीतों की वजह से मैं अपने सभी अनुभवों को फिर से  जी उठती हूँ. जरूरी ये नहीं कि वो यादें किसी इंसान से  जुड़ी हों, या किसी घटना से, बस मेरे हर सफर से एक कहानी, एक किस्सा जुड़ा है. जिस तरह से  कोई खुश्बू हमें यहाँ बैठे बैठे दुनिया  के किसी भी कोने में पहुँच जाते हैं, बस यही काम मेरे लिए ये गीत करते हैं. 

    ये गीत मुझे हर उस रात की  याद दिलाते हैं जो मैंने Indian Railways के general डिब्बे में सफर की  हैं या कहूं कि suffer की हैं. 

    साल 2017-19 में मेरा महीने में कम से कम एक बार तो घर जाना हो ही जाता था, कई बार तो दो तीन बार भी. रात को general डिब्बे में सफर करना मतलब पूरी रात जागरण ही होगा. Coke tudio वैसे तो कभी देखा नहीं, लेकिन कुछ एक गीत ऐसे ही अपनी journey में सुने तो जैसे दिल में ही बस गए. ऐसा ही एक गीत है Man Amadeh Am . बोल तो समझ नहीं आये  कभी लेकिन वो संगीत ही  काफी था, कि उस गीत को पूरी रात loop पर सुना जा सकता था. 

    बेगमपुरा एक्स्प्रेस की वो सुपरफास्ट स्पीड, छुट पुट नोंक झोंक और यात्रियों से ठसाठस भरा वो general डिब्बा, जहाँ एक बार अगर घुस गए तो अपने station से पहले आप तिल भर जगह भी नहीं हिल सकते हो। ऊपर से Ludhiana से ट्रेन में बैठ कर Moradabad तक ट्रेन सिर्फ यूँ तो तीन चार stations पर ही रुकती थी, लेकिन हर stop पर अच्छा खासा हुज़ूम होता था जो उसी overloaded डिब्बे में चढ़ने की फिराक में रहता था। बस उसी situation को देख कर मुझे भारतीयों की adjusting capability पर भरोसा हो जाता था. रात को चीरती हुई शाम 6:20 बजे Ludhiana से निकल कर ट्रेन सीधे 8:40 बजे Ambala ही रुकती थी। अगर किस्मत से खिड़की वाली मिल जाए तो प्लेटफॉर्म पर किसी vendor से खाने के लिए ले लिया जाय।, क्योंकि फिर ये ट्रेन सिर्फ Saharanpur ही रुकेगी वो भी 11:30 बजे। और तब तो कुछ मिलने से रहा।





    लेकिन खिड़की वाली सीट की एक बहुत बड़ी drawback ये है कि अगर तुम कुछ खरीद लो ना तो डिब्बे के सभी लोग पता नहीं कौन सी नींद से जाग जाते हैं। और जब तक ट्रेन प्लेटफॉर्म पर है, आप खाना ही pass करते रह जाते हो। 

Saharanpur के बाद ये ट्रेन रुकती है Moradabad, जहाँ पर मेरा इस ट्रेन का सफर रुक जाता है। बहुत जद्दोजहद के बाद उस ट्रेन से उतर के एक अलग होड़ होती है। क्योंकि मेरी अगली ट्रेन प्लेटफॉर्म 3 /4 पर आने वाली है जो मुझे अपने शहर तक ले जायेगी। 

15 मिनट का ही फ़ासला है इन दोनो ट्रेनों के समय में। बहुत ध्यान से प्लेटफॉर्म बदलने पड़ते हैं। और अगर Delhi से आने वाली ट्रेन लेट हो जाए तो मानो मुसीबत ही हो गयी है। मुरादाबाद जंक्शन यूँ तो एक बड़ा स्टेशन है जहाँ 24 घंटे ट्रेन चलती रहती हैं लेकिन रात 1:30 बजे कौन ही जगा रहता है.


उस वीरान प्लेटफॉर्म में एक भटकती आत्मा की तरह मैं कानों में earphones खोंसे उसी गीत को loop पर सुन रही हूँ, जिसका संगीत मुझे भा गया था. और अब तो थोड़ा थोड़ा गीत का भाव भी समझ में आने लग गया है. चलो खाली ही बैठे हैं तो उस गीत का translation ही पढ़ लिया जाये.


क्योंकि अब चाहे आसपास के लोग कितनी ही गहरी नींद में सोये हों, जिसकी ट्रेन थोड़ी ही देर में प्लेटफार्म पर आने वाली है, तो भला कैसे सोये. ऊपर से फिर से general डिब्बे में चढ़ना जो है. तो सोने का option तो है ही नहीं। और तभी एक मधुर आवाज आती है चाय वाले की.


जी हाँ, उस वीरान सन्नाटे में चाय-चाय की कर्कश आवाज जो कई सुप्त प्राणियों को उनके स्वप्नलोक से वापस लाने का साधन बन जाती है, मेरे लिए वो मधुर है क्योंकि इसी बहाने कोई दो शब्द बात करने को तो मिला, और जब Ambala और Saharanpur, दोनों ही जगह कुछ खाने को ना मिला हो तो तो उस थर्मोकोल के गिलास में नाम मात्र की चाय भी भूखे के लिए तिनके का सहारे सा काम करती है.

10 रूपये की चाय में यूँ तो cost benefit ratio की बात करना बेमानी है. लेकिन जब दिन से कुछ न खाया हो तो उस बेस्वाद चाय में भी मानो एक अलग ही तृप्ति होती थी.


ये सब बाहर हो रहा है, लेकिन मन के अंदर एक अलग ही धुन बज रही है.

"दिल संभल तो जाएगा पर सम्भले नहीं

तुम ही कोई रस्ता दिखाओ ना

बस यही मैं चाहूँ कि कोई बात करो

है सूना मन तुझ बिन आओ ना

तोरे नाम कर दूँ जो भी है मुझमें

तोरे नाम कर दूँ जो भी है मुझमें
बोले बोले दिल तेरा नाम मुझमें

बोले बोले दिल तेरा नाम."

Man Amadeh Am


और जब मेरी अगली ट्रेन  यानी कि रानीखेत एक्सप्रेस  प्लेटफार्म पर पहुँचती है, मैं नींद में ऊंघते हुए जनरल डिब्बे में चढ़ जाती हूँ. 




पर अब ये गीत लूप से हटा दिया है मैंने.  क्योंकि अब इस ट्रेन में थोड़ा भीड़ कम रहती है तो ये उम्मीद रहती है की अगर ठीक ठाक सीट मिल जाती है तो शायद एक दो घंटा आराम हो जाएगा. और जो खड़े खड़े ही जाना पड़ा, तो कोई नया गीत loop पर लगा लिए जाएगा, जिसके बोल न सही, संगीत मन को भा जाएगा. 


हर सफर में कोई हमसफ़र हो 
वाज़िब  नहीं, लाज़िमी भी नहीं 
बस एक नया गीत हो, एक नया किस्सा हो,
और मैं मिल जाऊं खुद से फिर एक बार 
यही क्या काफी नहीं .....

Friday, 15 September 2017

जीवन का आनंद 

                                                                      



अगर जीवन में  सब कुछ पूर्व निर्धारित हो, जैसा सोचा हो वैसा ही हो जाए तो जीवन की अनिश्चितता का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। 
हम यह सोच कर बैठें कि, आज के दिन  काम स्वयं हो जाएगा, और यदि वह काम  हो भी जाए ठीक उसी प्रकार, तो जीवन का विशेष लाभ नहीं उठा पाएंगे हम. 

बात तो तब है जब सारी तैयारियाँ धरी रह जाएं और एक विपरीत परिस्थिति हमारे समक्ष मुँह खोले आ जाए और हम उसी गर्मजोशी से उस विपरीत परिस्थिति का स्वागत करें. 
यही तो शिवता है, जब जैसी परिस्थिति उपस्थित हो, तब उसी प्रकार ढल जाएं। 
समुद्र मंथन में एक और कालकूट विष को कंठ में धारण किया दूसरी ओर सृष्टि का संहार कर नए सृजन को जन्म देना इतना आसान कार्य नहीं. बहुत विश्वास व ढृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता पड़ती है किसी भी निर्णय को लेने में। परन्तु उसी एक निर्णय को सटीक व उचित निर्णय बनाने के लिए अधिक त्याग व आत्मावलोकन चाहिए।
कठिन परिस्थितियों में जब एक आम मनुष्य यदा कदा झुंझला उठता, परेशान हो जाता है, तो दूसरी ओर विशिष्ट प्रतिभा व ढृढ़ इच्छाशक्ति का अपरिमित भण्डार लिए वही मनुष्य उन्हीं परिस्थितियों में विजय घोष के साथ पूरे भूमण्डल को गौरवान्वित करता है। 
और उसके इस कृत्य अथवा कार्य के लिए यदि कोई जिम्मेदार है, तो वो है सिर्फ उसका विश्वास। 
हार मान लेना यूँ  कठिन समय में सबसे सुगम व आसान मार्ग है, और जीतने के लिए संघर्ष करना तनिक दुर्गम पर आनंद तो जीतने में ही है. 

Monday, 4 September 2017

जीवन का मूल्य

"फ़ोन उठाओ साकेत! फोन उठाओ." मिसेज शर्मा बहुत चिंतित थी. बहुत देर से साकेत का नंबर नहीं लग रहा था. और जब फ़ोन लगा तो वो फ़ोन नहीं उठा रहा था. मिसेज शर्मा का मन अशांत हो गया. शॉपिंग करने जब आयी थी तब भी साकेत अपने कमरे से बाहर नहीं आया था। 
घर के नंबर पर भी कई बार ट्राय किया पर कोई जवाब नहीं मिला. वो अधिक बेचैन हो उठीं
"अभी तो रमा भी नहीं होगी घर पर, किसे कॉल करूँ?" सुमन अपने आप में ही बड़बड़ाने लगीं। तभी शर्मा जी का फ़ोन आया
उधर से सिर्फ इतना कहा की राजेश को फ़ाइल लेने घर भेज रहा हूँ. मिसेज शर्मा कुछ कहती उससे पहले ही डिसकनेक्ट हो गया. वो सोचने लगी, क्या उसे शर्मा जी से बात करनी चाहिए? लेकिन वो कहे भी तो क्या?
रोज एक ही बात पर घर की शान्ति भंग हो जाती है. बाप बेटे के बीच की तनातनी शाम की चाय से शुरू होकर रात के खाने तक निरन्तर चलती रहती है. सुमन के समझने के बावजूद भी तो शर्मा जी अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाते थे और साकेत भी कई बार घर छोड़ने की  बात कर चुका था .
आज कल खाने की टेबल पर पिता पुत्र का सामना नहीं हुआ था तो घर में कुछ दिनों से माहौल शांत है
पिछले कुछ दिनों से साकेत बदला बदला सा था.बहुत कम बोलता है, खाने का भी ध्यान नहीं रहता उसे. सुबह बहुत देर से उठता हैमाँ के कई बार पूछने के बाद भी उसने कुछ नहीं बताया
२० वर्षीय साकेत लखनऊ के बड़े उद्योगपति सुरेश शर्मा का एकलौता बेटा है. लखनऊ के एक नामी विद्यालय से पढाई करने के बाद साकेत का आर्ट्स पढ़ने का मन था, शर्मा जी का मानना था कि साकेत कॉमर्स की पढ़ाई करके उनका प्रतिष्ठान संभाले
साकेत के न चाहते हुए भी उन्होंने उसका दाखिला फैकल्टी ऑफ़ कॉमर्स में करा दिया. साकेत ने पापा को समझाने की बहुत कोशिश की पर हर बार वो डाँठ कर उसे चुप रहने को कहते. इस तरह साकेत बुझा बुझा सा रहने लगा. उसने कॉलेज जाने से मना किया तो शर्मा जी ने उसे ऑफिस आने का आदेश सुना दिया
"बहुत हुआ बचपना, अब बड़े हो गए तुम, छोटी छोटी बातों के लिए जिद करना ठीक नहीं. क्या कहेंगे मेरे दोस्त? पापा के बिजनेसमैन होने के बाद भी बेटा गालियों में घूम घूम कर चित्र बना रहा है. आखिर रखा क्या है आर्ट्स में?" शर्मा जी नाराज हो गए थे. "लेकिन पापा! आर्ट्स सिर्फ पेंटिंग नहीं. उसमें और भी कई सारे सब्जेक्ट्स होते हैं.  मुझे ह्यूमैनिटीज़ पढ़कर सोसाइटी के लिए कुछ करना है. "साकेत ने पापा को समझाने की एक और कोशिश करने की सोची
"हाहाहाहा." शर्मा जी ठहाका लगा कर हँस दिए. "तो मना किसने किया है,बेटा। मेरे बिजनेस में हाथ बंटाओ, मैं  खुद भी एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाना चाहता हूँ. पिताजी का सपना था कि शहर में माँ के नाम से एक अस्पताल हो जिसमें गरीब लोगों को मुफ्त में इलाज हो."
"लेकिन पापा, सिर्फ चैरिटेबल ट्रस्ट से ही सोसायटी के लिए कुछ किया जाए, ये जरुरी तो नहीं."
साकेत फिर बोल पड़ा
"बहुत हो गया साकेत, अब इस बारे में कोई बहस नहीं चाहिए मुझे।शर्मा जी इतना कहते हुए खाने की थाली छोड़ कर कमरे  में चले गए.
माँ साकेत को रोटी देते हुए बोली, "बेटा, पापा ने अपनी जिंदगी में बहुत से अनुभव लिए हैं, अगर उनके अनुभवों का इस्तेमाल करोगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी.  और फिर इतनी प्रॉपर्टी, हमारा सब कुछ कल तुम्हें ही तो संभालना है."
"लेकिन माँ,...” साकेत कुछ हे , तभी शर्मा जी ने उन्हें आवाज देकर अंदर आने को कहा. और मिसेज शर्मा साकेत को खाना देकर अंदर चले गयी
साकेत अब थक चुका था. उसे अब कोई रास्ता नजर नही रहा था.  पिछले हफ्ते साकेत के दोस्त अनिल ने उसे एक समाधान तो दिया लेकिन उससे उसका तनाव कम हुआ.उलटा साकेत अब गलत संगत में पड़ गया था .साकेत ड्रग्स लेने लगा था.पैसे की कमी थी नहीं, कॉलेज जाने के बहाने से उसने होटल में जाकर हीरोइन लेना शुरू दिया था
ये सब घटनाएं मिसेज शर्मा के मन को और कमजोर करने लगीं. ड्राइवर को बार बार स्पीड बढाने के लिए कहती हुई मिसेज शर्मा अपने पड़ोसियों को कॉल करने लगीं। संयोगवश किसी से भी संपर्क बन पाया तो अंत में शर्मा जी को कॉल करके मिसेज शर्मा ने उन्हें ही घर आने को कहा
वो अंदर ही अंदर खोखला हो गया था. जिंदगी में क्या रहा है, क्यों हो रहा है, उसे कुछ समझ नहीं रहा थातंग चुका था, इन सबसे छूटने का रास्ता ढूंढने को बेचैन था साकेत.
और आज उसे वो रास्ता उसे मिल गया थासाकेत चुपके से लॉकर से रिवाल्वर निकाल लाया. बहुत देर तक वह उसे देखता रहा. यूट्यूब पर कई वीडियो देखी थी उसने, कि कैसे रिवाल्वर चलायी जाती है. एक पल तो उसे बहुत डर लगा था. फिर अपनी कमीज की बाँह समेट, आँख बंद और दांत भींच कर उसने इंजेक्शन लगाया. उसे अब अच्छा लगने लगा था. एक ही झटके में उसने रिवाल्वर अपने माथे पर रखी और अगले ही पल ट्रिगर दबा कर अपनी जीवनलीला समाप्त करने का प्रथम एवं अंतिम प्रयास। 
जब मिसेज शर्मा घर पहुंची तो बाहर एम्बुलेंस देख कर उनके हाथ पाँव फूल गए. अनहोनी की आशंका से विचलित वे कार से उतरते ही गश खाकर पड़ी.
भाग कर शर्मा जी ने उन्हें संभालाजब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को अस्पताल में पाया. शर्मा जी को सामने देख कर मिसेज शर्मा ने साकेत के बारे में पूछा तो उन्होंने दूसरी ओर इशारा कर दिया.
साकेत को बचा लिया गया था,एक महीने बाद साकेत स्वस्थ हुआ तो शर्मा जी उसके पास आकर बोले, "बेटाएक बार हमारे बारे में भी सोच लिया होता तुमने."

साकेत मुस्कुरा दिया. आधे घंटे तक मृत्यु और जीवन के बीच के उस पड़ाव ने उसे जीवन का मूल्य समझा दिया था. उसने यह जान लिया कि जीवन ख़त्म कर लेने से समस्याएं सुलझती नहीं बल्कि और उलझती हैं.

बिंदी​ और आईना

रेलवे स्टेशन के बाथरूम के आईने पर चिपकी कुछ बिंदियों की कहानी है ये  ​..... लाल नीली हरी नारंगी कुछ चमकीली कुछ फीकी ​, कई बिंदियाँ बेतरतीब स...