Saturday, 6 March 2021
तुम हो ......
Thursday, 18 February 2021
कि लड़की हो तुम.....
मुझे हदें दिखाते हैं सब तुम ये काम न करो, कि लड़की हो. ये बात न कहो, कि लड़की हो. इस राह न चलो, कि लड़की हो. मुँह बंद कर सब सहो, कि लड़की हो.
मेरी मर्यादा बताते हैं सब
कि लड़की हो, घर की इज्जत हो तुम.
कि कपड़ों की नाप ही तुम्हारा चरित्र है अब.
कितनी ही समझ हो जाये दुनिया की, नासमझ हो तुम
कि सामर्थ्य से नहीं, पति के नाम से ही पहचान है अब.
मेरी सीमायें बांधते हैं सब.
अकेले बाहर कैसे जाओगी, कि अबला हो तुम.
मोटर कैसे चला पाओगी, कि कमज़ोर हो तुम.
अरे नौकरी कैसे करोगी, बेटी नहीं बहू जो हो तुम.
और सबसे अहम्, फैसले कैसे लोगी, भावुक हो तुम.
मेरे लिए फैसले लेते हैं सब.
किसी लड़के से बात भी कर लेना, असंगत है तुम्हारे लिए.
यूँ ही झोला उठाये घूमने निकल जाना, अप्रासंगिक है तुम्हारे लिए
किसी पुरुष के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं है तुम्हारे लिए
अपना जीवन होम कर देना, एकमात्र उद्देश्य है तुम्हारे लिए
मुझे मेरी जगह दिखाते हैं सब.
कि कभी पिता, कभी भाई और, कभी पति-पुत्र से संरक्षित हो तुम.
कि गर स्वतन्त्र हो गयी तो समाज के लिए चुनौती हो तुम
किसी से यदि सवाल कर लिया तो निरा उद्दंड ही हो तुम.
और जो किसी को पलट के जवाब ही दे दिया तो उत्छ्रंखल व निर्लज्ज हो तुम.
मुझे समय बताते हैं सब.
कि देर रात तक बाहर रहना, सुरक्षित नहीं तुम्हारे लिए
देर रात फ़ोन पर बतियाना, उचित नहीं तुम्हारे लिए.
कि अब ब्याह लो, घर बसा लो
कि काम तो शादी के बाद भी हो सकता है.
कि अब परिवार को आगे बढ़ाओ, कि तुम्हारा योगदान चाहिए
उसी समाज को जो तुम्हें ही हाशिये पर रखता है।
ये कुछ अटपटे सवाल हैं.
जो हर दिन पूछे जाते हैं मुझसे
कि लड़की हूँ मैं.
ये कुछ अजीब बातें हैं.
जिन्हें हर रोज सोचती हूँ मैं.
कि लड़की हूँ मैं.
ये कुछ अनकहे ताने हैं
जिनसे हर पल एक नयी जंग लड़ती हूँ मैं
कि लड़की हूँ मैं.
Saturday, 6 February 2021
MAN AMADEH AM
बेगमपुरा एक्स्प्रेस की वो सुपरफास्ट स्पीड, छुट पुट नोंक झोंक और यात्रियों से ठसाठस भरा वो general डिब्बा, जहाँ एक बार अगर घुस गए तो अपने station से पहले आप तिल भर जगह भी नहीं हिल सकते हो। ऊपर से Ludhiana से ट्रेन में बैठ कर Moradabad तक ट्रेन सिर्फ यूँ तो तीन चार stations पर ही रुकती थी, लेकिन हर stop पर अच्छा खासा हुज़ूम होता था जो उसी overloaded डिब्बे में चढ़ने की फिराक में रहता था। बस उसी situation को देख कर मुझे भारतीयों की adjusting capability पर भरोसा हो जाता था. रात को चीरती हुई शाम 6:20 बजे Ludhiana से निकल कर ट्रेन सीधे 8:40 बजे Ambala ही रुकती थी। अगर किस्मत से खिड़की वाली मिल जाए तो प्लेटफॉर्म पर किसी vendor से खाने के लिए ले लिया जाय।, क्योंकि फिर ये ट्रेन सिर्फ Saharanpur ही रुकेगी वो भी 11:30 बजे। और तब तो कुछ मिलने से रहा।
लेकिन खिड़की वाली सीट की एक बहुत बड़ी drawback ये है कि अगर तुम कुछ खरीद लो ना तो डिब्बे के सभी लोग पता नहीं कौन सी नींद से जाग जाते हैं। और जब तक ट्रेन प्लेटफॉर्म पर है, आप खाना ही pass करते रह जाते हो।
Saharanpur के बाद ये ट्रेन रुकती है Moradabad, जहाँ पर मेरा इस ट्रेन का सफर रुक जाता है। बहुत जद्दोजहद के बाद उस ट्रेन से उतर के एक अलग होड़ होती है। क्योंकि मेरी अगली ट्रेन प्लेटफॉर्म 3 /4 पर आने वाली है जो मुझे अपने शहर तक ले जायेगी।
15 मिनट का ही फ़ासला है इन दोनो ट्रेनों के समय में। बहुत ध्यान से प्लेटफॉर्म बदलने पड़ते हैं। और अगर Delhi से आने वाली ट्रेन लेट हो जाए तो मानो मुसीबत ही हो गयी है। मुरादाबाद जंक्शन यूँ तो एक बड़ा स्टेशन है जहाँ 24 घंटे ट्रेन चलती रहती हैं लेकिन रात 1:30 बजे कौन ही जगा रहता है.
उस वीरान प्लेटफॉर्म में एक भटकती आत्मा की तरह मैं कानों में earphones खोंसे उसी गीत को loop पर सुन रही हूँ, जिसका संगीत मुझे भा गया था. और अब तो थोड़ा थोड़ा गीत का भाव भी समझ में आने लग गया है. चलो खाली ही बैठे हैं तो उस गीत का translation ही पढ़ लिया जाये.
क्योंकि अब चाहे आसपास के लोग कितनी ही गहरी नींद में सोये हों, जिसकी ट्रेन थोड़ी ही देर में प्लेटफार्म पर आने वाली है, तो भला कैसे सोये. ऊपर से फिर से general डिब्बे में चढ़ना जो है. तो सोने का option तो है ही नहीं। और तभी एक मधुर आवाज आती है चाय वाले की.
जी हाँ, उस वीरान सन्नाटे में चाय-चाय की कर्कश आवाज जो कई सुप्त प्राणियों को उनके स्वप्नलोक से वापस लाने का साधन बन जाती है, मेरे लिए वो मधुर है क्योंकि इसी बहाने कोई दो शब्द बात करने को तो मिला, और जब Ambala और Saharanpur, दोनों ही जगह कुछ खाने को ना मिला हो तो तो उस थर्मोकोल के गिलास में नाम मात्र की चाय भी भूखे के लिए तिनके का सहारे सा काम करती है.
10 रूपये की चाय में यूँ तो cost benefit ratio की बात करना बेमानी है. लेकिन जब दिन से कुछ न खाया हो तो उस बेस्वाद चाय में भी मानो एक अलग ही तृप्ति होती थी.
ये सब बाहर हो रहा है, लेकिन मन के अंदर एक अलग ही धुन बज रही है.
"दिल संभल तो जाएगा पर सम्भले नहीं
तुम ही कोई रस्ता दिखाओ ना
बस यही मैं चाहूँ कि कोई बात करो
है सूना मन तुझ बिन आओ ना
तोरे नाम कर दूँ जो भी है मुझमें
बोले बोले दिल तेरा नाम."
और जब मेरी अगली ट्रेन यानी कि रानीखेत एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर पहुँचती है, मैं नींद में ऊंघते हुए जनरल डिब्बे में चढ़ जाती हूँ.
पर अब ये गीत लूप से हटा दिया है मैंने. क्योंकि अब इस ट्रेन में थोड़ा भीड़ कम रहती है तो ये उम्मीद रहती है की अगर ठीक ठाक सीट मिल जाती है तो शायद एक दो घंटा आराम हो जाएगा. और जो खड़े खड़े ही जाना पड़ा, तो कोई नया गीत loop पर लगा लिए जाएगा, जिसके बोल न सही, संगीत मन को भा जाएगा.
Friday, 15 September 2017
जीवन का आनंद
अगर जीवन में सब कुछ पूर्व निर्धारित हो, जैसा सोचा हो वैसा ही हो जाए तो जीवन की अनिश्चितता का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।
Monday, 4 September 2017
जीवन का मूल्य
बिंदी और आईना
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